सन् 1347, प्रभु का वर्ष। डरपोक ब्रदर एंसेल्म बीस बरसों से अपने मठ से बाहर नहीं निकले हैं, और उनकी हाथ से लिखी प्रार्थना-पोथी का आख़िरी पन्ना अब भी कोरा है, क्योंकि उन्होंने अब तक ऐसा कुछ देखा ही नहीं जो चित्र बनाने लायक़ हो। फिर एक दिन वे मठ के कुएँ में ज़रा ज़्यादा झुक जाते हैं और जा गिरते हैं रात के वक़्त बारिश में भीगे एक आधुनिक हाईवे पर। आगे कारें, फ़ोन और वेंडिंग मशीनें उनका इंतज़ार कर रही हैं, और ब्रदर एंसेल्म के पास हर एक की अपनी अनोखी व्याख्या है। शानदार ग़लतफ़हमियों से भरी, दिल को छू लेने वाली समय-यात्रा की एक कॉमेडी।
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सन् 1347, प्रभु का वर्ष। डरपोक ब्रदर एंसेल्म बीस बरसों से अपने मठ से बाहर नहीं निकले हैं, और उनकी हाथ से लिखी प्रार्थना-पोथी का आख़िरी पन्ना अब भी कोरा है, क्योंकि उन्होंने अब तक ऐसा कुछ देखा ही नहीं जो चित्र बनाने लायक़ हो। फिर एक दिन वे मठ के कुएँ में ज़रा ज़्यादा झुक जाते हैं और जा गिरते हैं रात के वक़्त बारिश में भीगे एक आधुनिक हाईवे पर। आगे कारें, फ़ोन और वेंडिंग मशीनें उनका इंतज़ार कर रही हैं, और ब्रदर एंसेल्म के पास हर एक की अपनी अनोखी व्याख्या है। शानदार ग़लतफ़हमियों से भरी, दिल को छू लेने वाली समय-यात्रा की एक कॉमेडी।